एक बार मैं यानी राजू अपनी छुट्टिया मनाने बिलासपुर (छत्तीसगढ) से लौट कर कटनी आ रहा था। हमेशा कि तरह मैने बिलासपुर-रीवा पैसेंजर में जनरल के डिब्बे में सफर कर रहा था। आज भी बोगी भीड से खचाखच भरी हुई थी, चूंकि ट्रेन बिलासपुर से ही शुरु होती है, इसलिये मुझे आसानी से सीट मिल गई। मैं ऊपर वाली सीट पर बैग रखकर नीचे खिडकी के किनारे वाली सीट मे जा बैठ गया।

वैसे मैं पहले स्वयं से परिचय कराता हूँ मेरा नाम राजीव कुमार पाण्डेय उर्फ राजू, जिला सागर मध्यप्रदेश का रहने वाला हूँ। लेकिन हाल में मेरा परिवार कटनी में निवास करता है। मेरे परिवार में पापा रामराज पाण्डेय, माता शकुंतला और बडी बहन रोश्नी है। जिसका विवाह कटनी में ही घर से कुछ दूरी पर एक माह बाद होनी है।

मैं व्यक्तित्व से बहुत ही बातूनी हूँ और मुझे नये नये लोगो से मिलना तथा लोगो के रहन सहन, दिनचर्या और क्रियाकलापो के बारे में जानना बहुत अच्छा लगता है। यही कारण है कि मैं आरक्षित सीटो की अपेक्षा सामान्य डिब्बे मे सफर करना पसंद करता हूँ, क्योकि यहा लोगो से बाते करना तथा पूछना आसान होता है। जिससे मुझे विभिन्न क्षेत्रो एवं रीति रिवाजो के बारे मे जानकारी मिलती है और आसानी से मेरा सफर भी कट जाता है।

उस दिन ट्रेन में कुछ ज्यादा ही भीड थी, लोग ऊपर वाली सीटों में भी ठसाठस बैठे हुये थे तथा काफी लोग खडे थे। अत: मैने अपना बैग नीचे उतार लिया और नीचे ही बैठना उचित समझा। वैसे ही मार्च की रात मे फागुनी हवा कुछ ज्यादा ही सुहावनी लग रही थी। फिर मेरे समीप बैठे एक सवारी ने मुझसे ताश खेलने की पेशकश की, जिसके बाद वही के कुछ सवारियों के साथ ताश खेलने लगा। तभी सभी का आपस मे परिचय होने लगा।

उनमें से एक का नाम संजीव लगभग उम्र 35 वर्ष का तथा दूसरा गोलू और एक बुजुर्ग रामगरीब थे। हम लोगो मे दहला पकड का खेल शुरू हो गया। बातो हो बातो मे पता चला कि रामगरीब जी अनूपपुर जिले के एक गोड आदिवासी समाज के थे, जो शहडोल के पास किसी गांव में अपने बेटे के ससुराल जा रहे थे। खेल जारी रहा और हंसी-मजाक में रात के दस बज रहे थे, ट्रेन आज कुछ लेट चल रही थी और अचानक ही ट्रेन मे ब्रेक लगा। पता चला कि ट्रेन को सिग्नल न मिल पाने के कारण किसी छोटे स्टेशन मे ही गाडी रोक दी। ऐसा तो सामान्यत: होता ही रहता है, इसलिये किसी को कुछ फर्क नही पडा। लेकिन गाडी को अब रुके हुये करीब आधा घंटा होने चला था ।

समय बीतने के साथ ही मेरे पेट मे चूहे कूदने लगे, अब मुझसे सहा नहीं जा रहा था, इसलिये स्टेशन पर ही उतर गया और इधर उधर टहलने लगा । पांच मिनट बाद जब ट्रेन के न चलने को लेकर मन आस्वस्त हो गया, तो स्टेशन बिल्डिंग की ओर बढ चला। कुछ दूरी पर मुझे एक बच्चा दिखाई दिया, जो बार- बार लोगो के पास जाता और शायद कुछ मांग रहा था, लेकिन बार-बार उसे निराशा ही हाथ लग रही थी। कुछ समय बाद मैने गौर किया कि वह हर व्यक्ति के पास न जाकर कुछ विशेष लोगो से ही मांग रहा है। तब तक ट्रेन के लगभग आधे पुरुष यात्री स्टेशन पर आ चुके थे और कुछ महिला सवारी थी। वह लडका बारी-बारी से चुनाव करता हुआ लोगो के पास जाता और वापस लौट आता था।

उस लडके के इस कार्य से मेरे मन जिज्ञासा ने जन्म लिया और मै करीब 25 मीटर की दूरी से ही देखने लगा। फिर मैने गौर किया कि वह सबके पास जा रहा है और उसने मुझे भी देखा लेकिन मेरे पास नहीं आया। तब मैने आगे बढकर उससे पूछा- ऐ छोटू! ये क्या कर रहे हो? उसने सीधे पलटकर जवाब दिया- तो से मतलब। मैं झिझक गया, लेकिन फिर उसे रोककर पूछा- छोटू का करत हो? उसने फिर जवाब दिया- मेरा नाम छोटू-वोटू नही, मेरा नाम सम्पत है, सम्पत। अच्छा सम्पत तुम कर क्या रहे हो, सबसे क्या मांग रहे हो?
सम्पत- मैं कुछ मांग नहीं रहा हूँ, लोगो से जूते पालिश कराने के लिये पूछ रहा हूँ।
तब मैं समझा कि वो (सम्पत) मेरे पास क्यू नहीं आ रहा था। फिर मैने पूछा- कि तुम्हारा पॉलिश का सामान कहाँ है और इतनी रात को यह काम क्यू कर रहे हो?
सम्पत- साहब! ये जो स्टेशन मास्टर है न हमको दिन मे कामइच नही करने देता और एक बार तो मेरा समान भी उठा लिया और दियाइच नहीं। इसलिये मैं छुपाकर रखता हूँ, जिससे ये फिर से मेरा समान न ले ले। जवाब देकर हंसने लगा और बोला- अच्छा चूतियां बनाता हूँ इसको।

हंसी सुनकर मैं आश्चर्य में पड गया कि लगभग 10-11 साल का बच्चा जिसे पढाई की उम्र में ये काम करना पड रहा है। खाने का कुछ खबर नहीं, फिर भी इतना खिलखिलाकर हंस कैसे रहा है। “शायद जिंदगी सब कुछ सिखा देती है।”
मैं- सम्पत! खाना खायेगा।
सम्पत- मैने तो खा लिया है।
मैं- क्या खाया?
सम्पत- वही मॉ ने दोपहर को रोटी बनाई थी, तो दाल रोटी खा के आया हूँ।
मैं आश्चर्य में पड गया। कितने बजे खाया है?
सम्पत- शाम को पांच बजे।
मैं- तो अब तो भूख लग रही होगी।
सम्पत- नहीं तो।
मैं सोचने लगा कि अभी मैने सात बजे समोसे खाये है और मुझे भूख लगने लगी, जबकि इसने तो पांच बजे यानि दो घंटे पह्ले।
मैं-सम्पत! बाहर कुछ खाने को मिलेगा।
उसने सोचा, फिर बोला- अभी तो मुश्किल है, लेकिन आगे ठेले में अगर बचा होगा तो मिल सकता है। फिर वो काम मे लग गया। इस बार उसे एक ग्राहक मिल गया, उसने पॉलिश किया।
मैं- सम्पत।
हाँ बोलो।
चलो मुझे ठेला तक ले चलोगे क्या?
सम्पत- क्या साहब, अभी काम वखत है, आप भी परेशान कर रहे हो। खुद ही चले जाओ। यही पास ही तो है, स्टेशन के बाहर आगे से लेफ्ट।
फिर वो काम पर लग गया- जूता पालिश, जूता पालिश।
मैं- सम्पत! अच्छा बताओ, तुमने आज कितना कमाया?
सम्पत- आज धंधा ठीक था, तो पचास रुपये मिल गये। नहीं तो ज्यादा ट्रेन रुकती नहीं है। साहब! तुम जाओ नहीं तो ठेला चला जायेगा।
मैं- प्लीज, सम्पत चलो न मेरे साथ।
सम्पत- चलो, मै चलता हूँ।

कुछ बडबडाते हुये वो मेरे साथ चलने लगा। पास ही ठेला खडा था।
मैं- भैया! क्या मिलेगा?
ठेलावाला- अब तो बस समोसा और फुल्की बची है। (फुल्की अर्थात गोलगप्पे)
मैं- भैया, दो जगह समोसे लगाना।
तभी सम्पत तपाक से बोला। साहब! मैने बोला न मुझे भूख नहीं है।
मैं- तो तुम क्या खाओगे, मुझे अकेले खाना अच्छा नहीं लगता। और अब से मुझे राजू भैया बोलना, साहब नहीं।
सम्पत-चलो ठीक है, मैं फुल्की खा लेता हूँ। फुल्की तो खिलइयो।

फिर हम अपना-अपना खाने लगे। तभी ट्रेन ने हॉर्न दिया, जैसे मैं तो ट्रेन के बारे में भूल ही गया था। जल्दी से ठेलेवाले को पैसे देकर भागने लगा और जब स्टेशन पहुंचा, ट्रेन नौ-दो ग्यारह हो चुकी थी। मैं फिर भी ज्यादा परेशान नहीं था। पता नहीं क्यूं? शायद इसलिये कि बैग में केवल चंद जोडी कपडे बस थे, जबकि मेरा मोबाइल और सारे पैसे मेरे पास ही थे। या तो फिर मेरे परेशां न होने की वजह सम्पत, मेरे साथ था। जो मेरे लिये काफी दुखी था और बोला- साहब! लो आपकी ट्रेन भी छूट गई, इस फुल्की की वजह से।
मैने उसे घूर के देखा, तो बोला- सॉरी राजू भैया। अब ठीक है न।
सम्पत- फिर अब क्या करेंगे।
मै-देखता हूँ, शायद रुकने की कोई जगह मिल जाये या स्टेशन में ही रुक जाता हूँ।
सम्पत- नहीं, स्टेशन में नहीं, चलो तुम मेरे घर चलो।
मैं- नहीं, तुम लोगो को परेशानी क्यूं दू, मैं मैनेज कर लूंगा।
सम्पत- वाह, अभी भाई बनाकर खाना खिलाया और अभी ही।
मैं आगे कुछ बोल ही नहीं पाया। सो मैं उसके साथ घर की ओर चल पडा। रास्ते मे उसके घरवालों के बारे मे पूछा।
सम्पत- मैं,मेरी मॉ और संध्या।
मैं- स्कूल जाते हो?
सम्पत- पहले जाता था, लेकिन पापा के बाद सब काम मुझे करना पडता है, तो बंद कर दिया।
मैं- क्या हुआ पापा को?
सम्पत- कुछ नहीं, ठंड बहुत थी और उस दिन कुछ खाया भी नहीं । सुबह देखा तो मर गया।
मैं सोचने लगा कि आज भी लोग भूख और ठंड से अकाल ही मर जाते है और हम लोग जरा सी ठंड में हीटर ढूढने लगते है।

तभी घर आ गया और सम्पत दौडते हुये, देखो मम्मी, कौन आया है?
मॉ- कौन आया है, बेटा?
सम्पत- ये राजू भैया है, इनकी ट्रेन छूट गई थी, तो मैं अपने घर ले आया।
सम्पत की मॉ थोडा परेशान सी दिख रही थी। शायद सोच रही थी, कि छोटे से घर में कहाँ सुलाऊंगी या कैसे व्यवस्था होगी। तभी मैं बोला- आप परेशान न होइये, मैं कहीन जगह ढूंढ लेता हूँ।
मॉ- ऐसी बात नहीं है, आओ बेटा अंदर आओ।
हम अंदर गये। सम्पत का घर दो कमरे का कच्चा मकान था, जिसमे जगह से ज्यादा सामान भरा हुआ था। सो मॉ ने मुझे बैठने के लिये जगह दी और हाल चाल पूछ्ने लगी। फिर मुझे काली चाय पिलाई जो मैने शायद पहली बार पी थी, लेकिन उसका स्वाद असीमित था। खाना खा के हम लोग सोने के चल दिये।

मैं और सम्पत अंदर के कमरे में गये, जहाँ केवल दो लोगो के सोने की जगह ही बची थी। लेकिन थकान के कारण कब नींद आ गई पता ही नहीं चला।
सुबह मेरी नींद करीब आठ बजे खुली तो देखा सम्पत बाहर अपने दोस्तो के साथ खेल रहा था। मॉ ने मुझे मुह-हाथ धोने के लिये कहा। मैं स्टेशन में बने शौचालय से फ्रेश होकर आया। तो मॉ ने पूछा- बेटा, चाय बना दूं, मैने हा मे जवाब दिया। मॉ दूध गर्म करने लगी, मैने तुरंत बोला- काली चाय। चाय पिलाकर मॉ खाना बनाने लगी।
अभी तक तो मैं घर और बहन की शादी की बाते जैसे भूल ही गया था, मुझे किसी प्रकार का टेंशन ही नहीं था। मैने घर में फोन लगाकर बात की और रात की घटना के बारे मे बताया। कुछ ही समय में मॉ ने खाना के लिये कहा।

खाने में चावल, आलू-टमाटर की सब्जी और पूडी थी। शायद कल के पैसे से ही दूध और सब्जी लेकर आई थी। लगभग 11 बजे खाना खाकर मैं और सम्पत गांव घूमने गये। गांव में हम लोग मंदिर, तालाब, विद्यालय, बाज़ार आदि स्थान घूमने गये। पता चला कि 2 बजे एक ट्रेन स्टेशन आने वाली है, जिससे मै अपने घर की ओर जा सकता हूँ।
अत: मैं 1 बजे मॉ से इजाजत लेकर स्टेशन के लिये सम्पत के साथ निकला। लेकिन न जाने मेरे मन में कौन सी बेचैनी पनप रही थी। सम्पत ने बताया कि वह सुबह गांव के ही होटल में काम पर जाता है, लेकिन आज वह काम पर नहीं गया।
मैं सोच ही रहा था, कि अचानक मैने सम्पत को साथ चलने के कह दिया और साथ रहने और पढाई करने के लिये कहा।
सम्पत- मम्मी और संध्या को छोडकर कहीं नहीं जाऊंगा। मैं कुछ बोल नहीं पाया।


ट्रेन के आने का समय हो चला था। मैने पर्स से कुछ पैसे निकाले और उसे देने लगा। उसने लेने से साफ इंकार कर दिया और बोला‌- भैया! आप से थोडे ही पैसे लूंगा। आपका तो मैने पालिश भी नहीं किया।
मैं- अरे! रख लो भैया की तरफ से।
सम्पत- मैं काम के अलावा कोई पैसे नहीं लेता।
ये सुनकर मैं फिर सोचने लगा कि पढाई हमने की है या इसने। हम पैसे मिलने की लालच में रिश्तेदारो के घर घूमने जाते थे।
शायद “जिंदगी से बडा शिक्षक कोई नहीं होता”।

तभी ट्रेन के हॉर्न बजने की आवाज़ आई और ट्रेन आ गई। मैं सम्पत को गले लगाकर चलने लगा और बाय का इशारा किया। उसने भी हंस के टाटा किया। उसका मुस्कुराते चेहरे में गज़ब की खुशी दिखी, जो कि सारे गमों और परेशानियों को भुलाकर जीवन के हर पल का आनंद लेने की सीख देती है। उसके चेहरे की चमक मुझे चमकते चांद की तरह लगी, जो अमावस की काली रातों में भले ही अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष करता है, लेकिन पूनम में पूरे जोर-शोर से चमकता है।

तभी ट्रेन चल दी और मैं उसकी ओर देखता रह गया।

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