इस हार जीत की दुनिया में,

अपनी रफ्तार मत बदलना।

गर जीत न सके तुम,

अपना आधार मत बदलना।

सह न सको गर नाकामयाबी,

अपना संसार मत बदलना।

रात है अभी, पर वक़्त बदला नहीं,

गर हो सके तो मन का श्रृंगार बदल देना॥

 

इक हार से दुनिया कभी रुकती नहीं,

थोडी सी बारिश में धरा थमती नहीं।

क्या हुआ गर दौड न सके तुम,

मिलेगा मौका जब, छलांग लगा देना।

लोग तो कुछ भी कहेंगे,

उनकी बातों पर ध्यान मत देना।

सुनकर तानें इनकी, अंज़ाम मत बदलना,

हो सके तो मन का श्रृंगार बदल देना॥

 

गिरकर उठना ही वीरों का काम है,

कल को भूलना ही जीने का नाम है।

शाम ढल जाये तो सूरज थकता नहीं,

रात हो जाये तो समय रुकता नहीं।

क्या हुआ सितारों में बादलों का साया है,

काली रात है अंधेरा जगमगाया है।

पर खुद को संवारने का अंदाज़ मत बदलना,

हो सके तो मन का श्रृंगार बदल देना॥

 

वक़्त आयेगा,

जब तेरी हर प्यास रंग लायेगी,

सितारे जाग जायेंगे, बदली छट जायेगी।

रात गुजर जायेगी, सवेरा भी आयेगा,

अमावस के बाद फिर उंजेला भी छायेगा।

जीवन में हर आस सफलता पायेगी,

जब लक्ष्य भेदकर तेरी पताका लहरायेगी।

तेरी कामयाबी से जब धरा जगमगायेगी ,

तब दुनिया भी तेरी जीत के किस्से सुनायेगी॥-2

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2 thoughts on “मन का श्रृंगार बदल दो”

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