माना कि विज्ञान है तू, ईश्वर का अभिमान है तू,
सारी पृथ्वी पर राज है तेरा
फिर तुझको क्यूं अभिमान ने घेरा……
मेरी हंसी छीनकर जब तू अपने शबाब पर होगा,
याद तू रखना बात मेरी, तेरा शहर नक़ाब में होगा…………..

नदियों को तूने बांध दिया,
जंगल को तूने छांट दिया,
धरती को भी न जाने कितनो हिस्सो में बांट दिया।
ना पंछी की वो बोली है,
ना किरणों की वो टोली है,
तूने अपने सुख की खातिर जाने क्या क्या बर्बाद किया॥

तू याद रख एक पल जग तेरे इतिहास के हिसाब में होगा,
तू याद ये रख बात मेरी तेरा शहर नक़ाब में होगा॥

पिंजरों में पंछी कैग किया, सैयादों को आज़ाद किया,
अपने ही हाथों से तूने, घर मेरा बर्बाद किया।


इक रोज़ ये पंछी उड जायेंगे, तेरा पिंजडा तोडकर,
तू रोयेगा मेरे आगे, अपने हाथों को जोडकर,
कि क्या खूब प्रकृति ने भी, मेरा हिसाब किया,
पंछी घूम रहे गगन में, सैयादो को क़ैद-ए-नक़ाब किया।

Written by Mr. Saurabh Shrivastava

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