बचपन के यादों की बरसात नहीं जाती,
खेलती मचलती जीवन की शुरुआत नहीं जाती,
माँ बाप के स्पर्श का अहसास नहीं जाती,
पर जाने क्यूं, होठों पर कोई बात नहीं आती।।

दोस्तों के यादों की हर बात नहीं जाती,
मास्टर जी से नंबरों की हर आस नहीं जाती,
खेलते लड़ते छुट्टियों की हर सांस नहीं जाती,
पर जाने क्यूं, होठों पर कोई बात नहीं आती।।

उनसे हुई वो पहली मुलाकात नहीं जाती,
यादों से उन वादों की हर कांस नहीं जाती,
दिल में लगे हर जख्मों की फांस नहीं जाती,
पर जाने क्यूं, होठों पर कोई बात नहीं आती।।

माँ के हाथों की स्वाद नहीं जाती,
पापा के डांटों की सौगात नहीं जाती,
देश की माटी की संताप नहीं जाती,
पर जाने क्यूं , होठों पर कोई बात नहीं आती।।

तन्हा कटी रातों की हर आग नहीं जाती,
आंखों से पलछिन की बरसात नहीं जाती,
चाहकर भी इस देह से ये सांस नहीं जाती,
पर जाने क्यूं , होठों पर कोई बात नहीं आती।।

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6 thoughts on “होठों पर कोई बात नहीं आती।।”

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