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 कविता – गांधी

 
देश गुलाम था, उठ रहा तूफान था,
जन-जन निराश थे, मन में न आस था।
चोट सह-सहकर, भूखे रह-रहकर,
गुलामी की जंज़ीर मे, जकड रहा देश था।
 
मन में इक प्यास थी, जीने की न आस थी,
उठ रहा था धुआं, मन में न आग था।
अत्याचार बढ रहा, हाहाकार मच रहा,
सत्ता की मोह में, बंट रहा देश था।
 
एक ज्योति थी जली, एक आस थी जगी,
करने अत्याचार खात्मा, आ गया महात्मा।
उसकी इक दहाड से, मुक्ति की ललकार से,
आज़ादी के तलाश में, जल उठा देश था।
 
न गोली, न शस्त्र से, बस प्रेम के अस्त्र से,
साम्राज़्य को ध्वस्त कर, देश को एकत्र कर्।
एकता, समानता, पवित्रता का वेश था,
अखंडता की  चाह में, मन में न व्देष था।
 
लाठियों की मार से, यातनाओं की दुलार से,
जेल जाते रहे, उम्मीदें जगाते रहे,
अहिंसा के अस्त्र से, सत्याग्रह के शस्त्र से,
हिला दिया साम्राज्य को, खडा किया देश था।
 
न मोह थी, न आस थी, बस आज़ादी की प्यास थी,
दिन वो था आ गया, दुश्मन को था भगा दिया।
अब देश का सम्मान है, खुद का संविधान है,
देश अब आज़ाद है, विश्व शांति की आस है॥
 
भारत माता की जय्।
 

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