A beautiful poem about sweet memory of childhood of a person describing about friend, school days.
 
कविता- खिलौने टूट जाते है।
 
बचपन के सारे खिलौने टूट जाते है,
समय के साथ सपने रूठ जाते है,
क्या मोल करें बचपन के वादों का,
जब दोस्ती के धागे टूट जाते है।।
 
बचपन में सारे बातों का मोल था,
कागज की कस्ती, तितलियों का खेल था,
मिट्टी पर खेले कबड्डी का खेल,
होता यही था जमाने से मेल।।
 
काँच के कंचे, बागों के झूले,
दिखावे की दुनिया क्या क्या हम भूले,
समय के साथ अपने छूट जाते है,
बचपन के सारे सपने टूट जाते है।।

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