बहुत ही सुंदर मनमोहक कविता जो आपको बचपन की यादों में ले जायेगी,
और आपकी नादानिया, मज़ाक, दोस्ती के किस्से याद दिलायेगी।
 
कविता‌- इक शाख मुझे दे बचपन की।
 
 
इक शाख मुझे दे बचपन की,
जिस पर यादें रहते हो,
कुछ अठखेलियां सी करते हो,
दिन सोए सोए रह्ते हो।
 
जब सूरज जागे रातो में,
कुछ सपने लिखते करते हो,
धीमी धीमी बरसातों में,
कुछ आंखे मींझा करते हो।
इक शाख ……….।
 
जब दोस्त संग स्कूलों में,
नटखट सी बातें करते थे,
परवाह नहीं इस दुनिया की,
कुछ हरकत ऐसी करते थे।
 
स्कूलों में आधी छुट्टी में,
जब टिफिन बांटा करते थे,
स्लेटों में लिख लिख कर,
जब दोस्ती निभाया करते थे।
इक शाख ……….।
 
खडी दोपहर छत पर चढकर,
पतंगबाज़ी करते थे,
ज़ान हथेली पर रखकर,
फिर पतंगे लूटा करते थे।
 
इक डोर के सहारे,
दुनिया थामा करते थे,
बल्ले, गिल्ली, गोट्टे, कंचे की,
पूंजी कमाया करते थे।
 इक शाख ……….।
 
जब पेड की शाखों में लटके,
झूला झूला करते थे,
कबड्डी के खेलों से,
ताकत आज़माया करते थे।
 
जब बिस्तर से छुप छुप कर,
यूं टीवी देखा करते थे,
पापा के घर पर आते ही,
यूं झोला थामा करते थे।
 इक शाख ……….।
 
गुड्डे-गुडियों की शादी मे,
जब रिश्तें टूटा करते थे,
छोटी-छोटी सी बातों में,
जब दोस्त रूठा करते थे।
 
सिक्कों की खनकों से,
जब कान खडे हो जाते थे,
एक रुपैया की खातिर,
जब लोग गिरवी हो जाते थे।
इक शाख ……….।
 
शाम ढलें जब सूरज डूबे,
छुपन छुपाई होती थी,
ठन्डी की रातों का सहारा,
गरम रजाई होती थी।
 
न पैसों का टेंशन था,
न स्टेटस की बातें थी,
बस माँ के हाथों की रोटी,
पापा की सौगातें थी।
इक शाख ……….।
 

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6 thoughts on “A Beautiful poem about memory of Childhood”

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