कविता- प्यार – एक अनकही कहानी

  सर्द दिसम्बर की रात थी,
शायद दो साल पुरानी बात थी।

मैं चल पड़ा था अपनी डगर,
पर न थी मुझे कुछ ख़बर।
होने वाला क्या हादसा मेरे साथ है,
घटने वाली जाने क्या वारदात है।

छोड़कर अपनी रेल था पछता रहा,
सर्द काली रात मे भटकता रहा।
थी मंजिल कहाँ कुछ ठिकाना न था,
लौट आता वही कुछ पता ही न था।

रात में जब बारह बजाती घड़ी,
देखा मैनें उसे वहाँ पर खड़ी।
देख उसको मेरा दिल मेरा न रहा,
दिल मेरा जोरों से धड़कने लगा।

नूर से उसके रजनी थी फीकी पड़ी,
अमावस में जैसे चादनी थी चमक रही।
हुस्न-ए-आफताब देख के पागल हुआ,
नजरों के तीर से दिल घायल हुआ।

इश्क-ए-बेदर्द दिल ने कहानी कही,
लब्ज न थे पर दर्द-ए-जुबानी कही।
दिल की दास्तां लेकर आजमाइश में,
मैं आगे बढ़ा इश्क-ए-फरमाइश में।

चमकते हुये चेहरे का नूर,
मचलते हुये पहरे का सुरूर।
होठ में जैसे रक्त की लाली,
चेहरे में थी परदे की जाली।

सर्द रात में बदन की ठिठुरन,
फडफडाते हुये लबों की उतरन।
भडकते हुये कमर की म्यान से,
जैसे तराशा हो ख़ुदा ने इत्मिनान से।

देख उसको मेरा दिल मचलता रहा,
जागते जागते सपने गढ़ता रहा।
नजरों नजरों से ही बताने लगा,
दिल में था क्या ये जताने लगा।

बोला चाहता हूँ तुझको दिलो जान से,
उठ खडा हुआ मैं बडे़ शान से।
बढती हुई सांसो की रफ्तार से,
मै परेशां था खामोशी की मार से।

कान मे झुमका उनके लटकता रहा,
शब्द सुनने को मैं तड़पता रहा।
हाथ में उनके चूड़िया खनकती रही,
दिल में मेरे चिंगारी भड़कती रही।

सुन के दास्तां उसकी मचल सा गया,
सुन के सिसकियाँ उसकी सिहर सा गया।

चल पड़ी वो किधर मैं अंजान था,
पीछे पीछे चला मैं परेशान था।
नजरों से उसने इशारा किया,
देखते देखते ही किनारा किया।

देख माज़रा वहाँ का मैं हैरान था,
हो गया मैं स्तब्ध जैसे बेजान था।
शब्द सारे मेरे थे टूटने लगे,
आँख से गंगा जमुना फूटने लगे।

रक्त बिखरा वहाँ चहुं ओर था,
रुक गया मन में जो शोर था।
एक बच्चा वहाँ पर बिलखता रहा,
माँ से अपने लिपटता रहा।

मैनें देखा उसे वो बेजान थी,
और कोई नहीं वो मेरी जान थी।
अहसास-ए-इश्क को खुदा जानकर,
ले चला मैं उसे निशां-ए-इश्क मानकर।-2

One thought on “A incidential poetic/shayari story of a men in a cold night. He saw a girl and lost his heart. Story of a mother and child.”

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