A poem about a person that lost his love and his feeling about her titled with ‘TERE BINA JEENA’
 he is compairing his sadness with nature.

कविता- तेरे बिन जीना

तेरे बिन जीना
मेरे जीवन की अनकही सजा,
जैसे पतझड़ में पात बिन हवा।
 
यूं तो पत्ते भी लौट आयेंगे,
कलियाँ भी खिल जायेंगे,
 हवा फिर चहचहायेगी,
पतझड़ के बाद।
 
तेरे बिन जीना
मेरे जीवन की अनकही सजा,
जैसे पतझड़ में नीर बिन मीन।
 
यूं तो जलधर फिर गड़गडायेंगे,
ऋतु सुहावन फिर लौट आयेंगे,
मकर फिर गुनगनायेंगे,
पतझड़ के बाद।
 
तेरे बिन जीना
मेरे जीवन की अनकही सजा,
जैसे पतझड़ में काश्त बिन खेत।
 
यूं तो अंकुर फिर अकुरायेंगे,
काश्त जीवन लहलहायेंगे,
दिन हराहर लौट आयेंगे,
पतझड़ के बाद।
 
तेरे बिन जीना
मेरे जीवन की अनकही सजा हो गई,
जैसे पतझड़ में नीर बिन कुआं ।
 
यूं तो कूप फिर भर जाएंगे,
नीर ध्वनि फिर कलकलायेंगे,
पनघट फिर भीग जाएंगे,
पतझड़ के बाद।
 
तेरे बिन जीना
मेरे जीवन की अनकही सजा हो गई,
जैसे पतझड़ में आपकी दुआं ।
 
न जाने कब लौट के आयेंगे,
क्या दिन हमारे संवर पायेंगे,
राह तकते-तकते हम मर जाएंगे,
पतझड़ के बाद।
 
तेरे बिन जीना
मेरे जीवन की अनकही सजा हो गई,
जैसे पतझड़ में पात बिन हवा हो गई।
 

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