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भाग -1 – https://abhirewadi.in/filmyrockers/

रणवीर घर में चिट्ठी रखकर अपने सपनों के पीछे निकल गया, लेकिन वह चिट्ठी में उस शहर का नाम लिखना भूल गया। घर में उसकी चिट्ठी पढकर बवाल मच गया, घर वाले परेशान कहॉ ढूंढे? दोस्तो को फोन करके पता किया लेकिन कोई जानकारी नहीं मिली। तब जाकर रणवीर के गुमशुदा की रिपोर्ट लिखाने पुलिस थाने गये लेकिन वहॉ से भी कोई खास आश्वासन नहीं मिला।

इधर रणवीर अपने सपनो के पूरा सपनों की नगरी, बॉलीवुड की राजधानी मुम्बई आ गया। लेकिन शायद मुम्बई को उसका आना रास नहीं आया, इसीलिये उसके आने से पहले ही कंगाली और भुखमरी ने उसका दामन थाम लिया। हुआ ऐसा कि, जब ट्रेन सी एस टी स्टेशन पहुचने वाली थी, तभी रणवीर की बगल वाली सीट में एक सुंदर सा हष्ट-पुष्ट लडका आकर बैठा और बातचीत करते करते मानो दोस्ती हो गयी। लेकिन स्टेशन में उतरते ही उस लडके ने उसका बैग पार कर दिया और जब तक रणवीर कुछ समझ पाता वह लडका जैसे गायब हो गया। अब रणवीर के पास न ही कपडे बचे और न पैसे, चोरी के डर से ही तो बैग में पैसे रखे थे और अब तो बैग ही पार हो गया।

निराश होकर रणवीर स्टेशन से बाहर निकला और पास ही जाकर बैठ गया और घर के बारे में सोचने लगा, लेकिन उसके पास तो पैसे भी नहीं थे कि घर में फोन तक लगा सके।
वह कुछ देर उदास होकर बैठा रहा, लेकिन उसका पेट शायद उसकी बेबसी को नहीं समझ पा रहे था। वह उठा और इधर उधर भटकने लगा कि कहीं पानी ही मिल जाये, लेकिन इतने बडे शहर में पानी भी मुफ्त में नही मिला। फिर वह जाकर पार्क के पास बैठ गया और अपने निर्णय पर पछ्ताने लगा। तभी उसके कानों में एक बडापाव वाले की आवाज़ सुनाई दी, लेकिन उसको यह आवाज़ कुछ पहचानी सी लगी। इस आवाज़ ने जैसे उसके मन में उम्मीद की लहर जगा दी थी। वह झट से उठा और बडापाव वाले के पास गया और बोला।
रणवीर- का चचा, यूपी से हो का?
दुकानदार- हाँ बाबू, तुम कहा से हो?
रणवीर- कानपुर से चचा।
चचा, कोनो काम मिलेगा क्या?
दुकानदार- का हुआ बाबू, परेशान लग रहे हो।
रणवीर ने अपनी आपबीती दुकानदार को सुनाई और काम के लिये पूछा।
दुकानदार- बाबू, काम कहाँ मिलेगा, यहाँ बडी मुश्किल से दो बख़त की रोटी मिल पाती है और उसने खाने के लिये रणवीर को बडापाव और पानी दिया।

तभी वहॉ कुछ विदेशी आये और कुछ पूछ्ने लगे, लेकिन दुकानदार को कुछ समझ नही आ रहा था, तब रणवीर ने दोनो के मध्य मध्यस्थता की और विदेशियो से बात की।
दुकानदार- बाबू, पढे लिखे जान पढते हो और अंग्रेजी भी बोल लेते हो।
देखते है, कही काम के लिये बात करते है। लेकिन तब तक बाबू, खाओगे, रहोगे कहा?
रणवीर- चचा, आप कहो तो जब तक कही काम नही मिलता, तब तक आपके साथ यही काम कर लेता हूँ। आप पैसे मत देना लेकिन तब तक रहने खाने को बस मिल जाता।
दुकानदार- बाबू, “ये मुम्बई है, यहाँ सबसे सस्ती है जिंदगी और सबसे मंहगा है जिंदा रहना”।
बाबू खाने की व्यवस्था तो मैं कर दूंगा, लेकिन रहने के लिये समस्या होगी।
रणवीर के मन में कुछ उम्मीद जगी और बोला- चचा, मै कही भी पडा रहूंगा।
दुकानदार- बाबू यहाँ गुसलखाने जितने कमरे में पांच लोग रहते है, चलो देखेंगे क्या व्यवस्था होती है।

शाम तक रणवीर वही बैठा रहा और जो कुछ काम होता, करने की कोशिश करने लगा। रात में दोनो घर की ओर चल दिये, जो कि वहाँ से लगभग 5 किमी दूर था। घर पहुंच कर देखा, तो छोटा सा कमरा था, उसमे भी पांच लोग रहते थे। सबने खाना खाया और रणवीर के लिये सोने की जगह नही थी, तो बरामदे में ही सो गया। सुबह दोनो काम पर निकले, तब उसने असली मुम्बई के दर्शन किये। आज दुकान में कुछ ज्यादा ही चमक थी, शायद रणवीर का व्यक्तित्व ही ऐसा था, कि लोग उसकी ओर खिचे चले आते थे। वह लोगों से हंसते हुये बाते करता, जिससे लोग काफी आकर्षित होते। ये क्या, आज तो दुकान का सारा सामान आठ बजे ही खत्म होने चला था। लगभग नौ बजे सारा काम निपटाकर दोनो घर के लिये निकल गये।
रणवीर- क्या चचा, बस इतना ही सामान था, कितना मजा आ रहा था और अभी तो लोगो के रात के खाने का समय हो रहा है और कितनी ग्राहक और मिलते।
दुकानदार- अरे ठहर जा बाबू, जानता है जितना बडापाव आज तूने बेचा है, उतना मैं केवल किसी त्योहार या रविवार को ही बेच पाता हूँ, वो भी रात के दस-ग्यारह बज जाते है। लेकिन तुझमे कुछ बात है, तेरे रहने से जैसे ग्राहक खिंचते चले आते है।

इस तरह एक हफ्ते बीतने लगे, तब रणवीर ने दुकानदार से कुछ पैसे मांगे।
दुकानदार- क्या हुआ बाबू, कुछ चहिये क्या?
रणवीर- सोच रहा था, कि एक बार घर मे बात कर लूं, वो लोग भी परेशान होंगे और अपने लिये कुछ कपडे ले लेता, आपके कपडे में तो मैं डूब जाता हूँ।
दुकानदार ने उसे 500रु का नोट दिया और सम्भाल के खर्च करने कि हिदायत दी।

रात को घर लौटते समय दुकानदार ने उससे कहा- के मैने रम्मा से तेरे नौकरी के लिये बात की थी और परसो तुझे काम के लिये उसके सेठ ने मिलने बुलाया है। कहते है, बहुत बडा आदमी है और खतरनाक है थोडा सम्भल के जाना। यह सुन के रणवीर बहुत खुश हुआ, लेकिन थोडा तनाव में पड गया, कि कभी नौकरी के लिये गया नहीं हूँ, वहाँ क्या होगा, कैसे करना होगा? इसी तनाव में अगला दिन भी बीत गया। नौकरी की उम्मीद और तनाव ने उसे रात भर सोने नही दिया। अगले दिन सुबह वह उठा और नये कपडे पहनकर वो नौकरी के लिये गया।

वहाँ पहुंचा तो देखा आलीशान बंगला गाडियों और नौकर चाकरों की लाइन लगी थी। रम्मा भी जाकर उसी लाइन में जाकर खडा हो गया और रणवीर भी साथ में जाकर खडा हो गया। वहाँ सबकी जांच के बाद ही अंदर जाने दिया जा रहा था, अब हमारा नम्बर था वहाँ खडे बॉडीगार्ड ने हमसे पूछा- क्यू रे रम्मा, ये किसको साथ लेकर आया है?
रम्मा- साहब, ये मेरा भतीजा है, गांव से आया है। नौकरी के लिये साथ लाया हूँ। बात किया था मैने मालिक से।
बॉडीगार्ड- ए चल तू वहाँ जाकर बैठ जा।
रणवीर थोडा सा डरा हुआ, पास ही जाकर खडा हो गया। देखते ही देखते सब लोग कही गायब हो चुके थे और वह वही खडा रहा। अब वहाँ कोई और नहीं था। काफी समय बीतने के बाद अंदर से बुलावा आया और वह अंदर चला गया। अंदर एक आलीशान सा हाल इतना बडा जिसमे तो 2-4 घर समा जाये। रणवीर वही जाकर खडा हो गया।

कुछ देर में एक सुंदर सी 25-27 साल की लडकी सामने आकर सोफे में बैठ गई। जिसने अपना नाम रिया राणा था और वो मालिक संजीव राणा की इकलौती बेटी थी, जो कि मालिक के बिजनिस में उनका साथ देती थी।
रिया- तो तुम हो, जिसे पापा ने काम के लिये बुलाया है।
रणवीर- जी जी मैडम, वो रम्मा चाचा ने बात किया था।
रिया- क्या! रम्मा, हू इस दिस? तुम काम कर लोगे।
रणवीर- जी मैडम, काम क्या करना होगा?
रिया- व्हाट द ****? तुम्हे ये भी नहीं पता, तो करने क्या आये हो?
रणवीर- जी काम ढूढने आया हूँ।
रिया- डिग्री वगैरह कुछ लाये हो या ऐसे ही मुह उठा के चले आये।
रणवीर ने कोई जवाब नहीं दिया और सिर झुकाये खडा रहा।
रिया- कुछ जवाब दोगे या…। यू इलिट्रेट पीपल, व्हाट डू यू थिंक, व्हाय यू कम हीयर? शेमलेस पीपल।
अब रणवीर भी आपे से बाहर चला और बोला- वो हेल्लो, व्हाट यू थिंक, ओनली यू हैव अ टंग इन योर माउथ। यस आई वाज अ मैड, दैट्स व्हाय आई केम हीयर।
इतना सुनकर रिया आग बबूला हो गई।
रिया- गेट आउट फ्रॉम हीयर यू स्काउंड्रल।
उसने नौकर को बुलाया और रणवीर को घर से बाहर निकलवा दिया।

रणवीर घर आकर से बडापाव की दुकान में आकर काम पर लग गया।
दुकानदार- अच्छा हुआ तू आ गया, आज तो जैसे ग्राहक ही कहीं गायब हो गये।
रणवीर- इसीलिये तो मै आ गया, अब दोनो मिलके रंग जमायेंगे।
दुकानदार- तेरी नौकरी का क्या हुआ?
रणवीर- कुछ नहीं, मज़ा नहीं आया। उससे अच्छा मैं अपने चचा के साथ ही क्यूं न रहूं।
इस तरह चचा के साथ बडापाव के दुकान में काम करते करते 15 दिन से अधिक हो गये। एक दिन दुकान में एक बडी सी कार आकर रुकी और ड्राइवर ने रणवीर को इशारा करके 2 बडापाव मंगाया और जब रणवीर पैसे लेने गया। तो देखा रिया अंदर बैठी थी।
रणवीर- मैडम, पैसे।
रिया- कितने हुये?
रणवीर- मैडम, 10 रुपये।
रिया- कल घर आकर ले जाना और कार चल दी।

रणवीर का गुस्सा अभी भी शांत नहीं हुआ था, सो वह 3 दिन तक राणा साहब के घर गया ही नहीं। चचा के बहुत कहने समझाने पर आखिरकार चौथे दिन वो राणा साहब के घर जाने के लिये निकल गया।


(आपको ये कहानी कैसी लगी, नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखे आपके प्रतिक्रिया के आधार पर मैं जल्दी ही अगला भाग लाने की कोशिश करूंगा।)

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