इक गहरी काली रात थी,
धीमी-धीमी बरसात थी।
लबों से टपकती बारिश की बूंदे,
गर्म सांसों की एहसास थी।

देखा उन्हें जब वो खामोश थे,
खो गए उनके आगोश में।
चेहरा था कुछ अनजाना सा,
पर दिल को लगा पहचाना सा।

टपकती कोई आंसुओ की लता,
सिसकती हुई सांसों की सदा।
कह रही थी मेरा हाथ थाम ले,
ले चल मुझे और इक नाम दे।

उसके हाथो में थी इक प्यारी घड़ी,
न जाने वहां पर थी कब से खड़ी।
जैसे दुनियां में कोई अपना ना रहा,
मन में कोई सपना ना रहा।


चल पड़ीं किस डगर राह अनजान था,
होने वाला था क्या न कोई ज्ञान था।
देख हालत उसकी मैं परेशान था,
उठ रहा दिल में इक तूफान था।

देखा मैंने उसे जब बड़े प्यार से,
रो रही थी वो दुनिया की तकरार से।
आंसुओ ने सारी कहानी कहीं,
पल में ही जोड़ डाले रिश्ते कई ।

देखा मैने उसे दिल की दरार से,
आगे बढ़ा मैं दिल लेके प्यार से,
लग रहा था कोई कली खिल गई,
जैसे तूफान में कोई परी मिल गई।

चल पड़ा मैं दिल में कसक लेकर,
मंजिल में था कोई सबक लेकर,
न रिश्ता, न बंधन, मै बेगाना सा,
पर दिल को लगा पहचाना सा।

बढ़ रही धड़कनों की रफ्तार थी,
आने वाले अड़चनों की दरकार थी,
दिल ही दिल उसे अपना मानकर,
चल पड़ा मैं उसके करो को थामकर।

उसके नम से करो के स्पर्श से,
हौसला उठ खड़ा था नभ में फर्श से,
अब न डर था दुनिया के लाज का,
डर था तो उसके बदन के प्याज का।

भीगे-भीगे बदन में थी घबरा रही,
बहके-बहके कदम से थी डगमगा रही,
आस तू है तुझको खुदा मानके,
ले चल मुझे तू और इक नाम दे।

आने वाली थी मंजिल, दिल बेचैन था,
लड़खड़ाते हुए कदमों में पेन था।

आ गई थी मंजिल सब हैरान थे,
साथ मेरे था ‘कौन’ अनजान थे।
सुन के दास्तां उसकी सब परेशान थे,
चुप थे सारे जैसे सब बेजान थे।


ऐसे अपनाया उसको ममता दुलार से,
जैसे पूरी हुई कमी परिवार से।
देकर नाम उसको मैं था इतरा रहा,
पाकर बेटी जैसे दिल का टुकड़ा रहा।


अब न कोई था बेगाना, न अंजान था,
थम गया था दिल में जो तूफान था।
खुश था मैं यू दिल की बात मानकर,
चल पड़ा था मैं उसके करो को थामकर।।

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